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भारत के राष्ट्रपति, श्री राम नाथ कोविन्द का 61वें वार्षिक बोडो साहित्य सभा सम्मेलन में सम्बोधन

तामुलपुर: 04.05.2022

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बोडो भाषा, साहित्य तथा संस्कृति के गौरव को बढ़ाने के लिए मैं आप सबकी सराहना करता हूं। मुझे इस समारोह में शामिल होकर बहुत प्रसन्नता हुई है। इस सम्मेलन के सभी आयोजकों को मैं हार्दिक बधाई देता हूं।

मुझे बताया गया है कि असम में लगभग 35 लाख लोग बोडो भाषा बोलते हैं। असम के अलावा बोडो भाषा बोलने वाले लोग पश्चिम बंगाल,मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम,नगालैण्ड और त्रिपुरा तथा बांग्लादेश और नेपाल में भी निवास करते हैं। मुझे यह देखकर प्रसन्नता हुई है कि सिक्किम तथा मेघालय के मुख्यमंत्री भी इस समारोह में उपस्थित हैं जोकि बोडो भाषा के विस्तृत परिवार से जुड़े हुए हैं। यह भी विशेष प्रसन्नता की बात है किबांग्लादेश और नेपाल के बोडो भाषी प्रतिनिधि भी यहां उपस्थित हैं।

इसी वर्ष जनवरी में गठित तामुलपुर जिले के उज्ज्वल भविष्य के लिए मैं यहां के निवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं देता हूं।

केंद्र सरकार और पूर्वोत्तर के राज्यों की सरकारों के संयुक्त प्रयासों से इस क्षेत्र में सौहार्द और शांति का वातावरण और मजबूत बनता जा रहा है। इस परिवर्तन के लिए मैं केंद्र सरकार , राज्य सरकार तथा बोडो क्षेत्र के सभी भाइयों और बहनों को बधाई देता हूं।

इस बदलाव में विकास कार्यों की महत्वपूर्ण भूमिका है। मुझे बताया गया है कि इस क्षेत्र में एक सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी स्थापित है जिसे विश्वविद्यालय का दर्जा प्राप्त है। कोकराझार में स्थित बोडोलैंड यूनिवर्सिटी जिसके चांसलर राज्यपाल महोदय हैं, तथा अनेक महाविद्यालयों और पॉलीटेकनिक्स में विद्यार्थीगण शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं और अपने उज्ज्वल भविष्य की राह बना रहे हैं। इसके अलावा अनेक उच्च शिक्षण संस्थानों की स्थापना को मंजूरी दी गई है। यह प्रसन्नता की बात है कि इस सभा स्थल के क्षेत्र में एक मेडिकल कॉलेज स्थापित किया जाएगा।

असम के राज्यपाल प्रोफेसर जगदीश मुखी के मार्गदर्शन तथा मुख्यमंत्री डॉक्टर हिमंत बिश्व शर्मा के नेतृत्व में असम की जनता के हित में अनेक कार्य किए जा रहे है। विकास तथा जन कल्याण के ऐसे कार्यों के लिए मैं राज्य सरकार की पूरी टीम की सराहना करता हूं। मुझे बताया गया है कि विधानसभा के अध्यक्ष श्री बिश्वजीत दैमारी ने बोडो भाषा के प्रसार के लिए और इस सम्मेलन के आयोजन में भी योगदान दिया है। मैं श्री दैमारी जी को साधुवाद देता हूं।

देवियो और सज्जनो,

बोडो समाज के लोगों से मेरा पुराना परिचय रहा है। मेरे लिए बोडो संस्कृति और भाषा से संपर्क कोई नई बात नहीं है। जब मैं सांसद था तब इस क्षेत्र के कई जन-सेवकों के साथ मेरा मिलना-जुलना होता था। हम सब गर्मजोशी के साथ मिलते थे और बातचीत करते थे। उनमें से मेरे कुछ परिचित तो आज की सभा में भी उपस्थित हैं। उदाहरण के लिए यहां उपस्थित श्री यू. जी. ब्रह्मा जी ने न केवल एक जन-प्रतिनिधि और असम सरकार में मंत्री के रूप में अपनी पहचान बनाई है बल्कि वे साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किए जा चुके हैं।

मेरा ध्यान इस बात पर गया कि मई का महीना बोडो भाई-बहनों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। हर साल 1 मई को आप सब बोडोफा उपेन्द्र नाथ ब्रह्मा जी की पुण्य तिथि मनाते हैं , जो आज से तीन दिन पहले ही थी। बोडोफा ने "जियो और जीने दो” के महान संदेश को प्रसारित किया था। बोडो आत्म-गौरव के प्रति सचेत रहते हुए, सभी समुदायों के साथ सद्भाव बनाए रखने का बोडोफा का संदेश हम सभी के लिए एक मंत्र जैसा है। मैं उनके संदेश को उन्हीं के शब्दों में ठीक-ठीक कह तो नहीं सकता लेकिन उनके संदेश को बोडो भाषा में दोहराने का प्रयास अवश्य करूंगा। उन्होंने कहा था:

"थां, आरो थान्नानइ थानो ह।”

शिक्षा के माध्यम के रूप में बोडो भाषा को मान्यता देने का उत्सव वर्ष 1963 से प्रतिवर्ष 18 मई को मनाया जाता है। आज से लगभग15 दिन बाद आप सब वह उत्सव मनाएंगे। उस महत्वपूर्ण उत्सव की मैं आप सबको अग्रिम बधाई देता हूं।

देवियो और सज्जनो,

बोडो भाषा, साहित्य तथा संस्कृति के उत्थान हेतु लगभग 70 वर्षों से अमूल्य योगदान देने के लिए बोडो साहित्य सभा का प्रयास उल्लेखनीय है। सभा के संस्थापक-अध्यक्ष स्वर्गीय जॉय भद्र हागज़ेर तथा महासचिव सोनाराम थाओसेन ने बोडो भाषा के महत्व और मान्यता में वृद्धि करने के सराहनीय प्रयास किए थे। स्कूली शिक्षा के माध्यम के रूप में बोडो भाषा के प्रयोग को स्वीकृति दिलाने तथा उच्च शिक्षा में बोडो भाषा को स्थान दिलाने जैसे प्रयासों में बोडो साहित्य सभा ने अग्रणी भूमिका निभाई है। आप लोगों के प्रयास के फलस्वरूप बोडो भाषा को असम राज्य की एसोसिएट ऑफिशल लैंगवेज का दर्जा प्राप्त हुआ है।

बोडो भाषा और साहित्य को आगे बढ़ाने वाले महानुभावों का इतिहास बहुत प्रेरणादायक है। बीसवीं सदी के आरंभ में बोडो पुनर्जागरण के जनक गुरुदेव श्री कालीचरण ब्रह्मा ने समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने के प्रयासों के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा व सांस्कृतिक चेतना का भी प्रसार किया। श्री रूपनाथ ब्रह्मा ने बोडो पुनर्जागरण की धारा को आगे बढ़ाते हुए बोडो भाषा और साहित्य को समृद्ध किया।

बोडो भाषा और साहित्य के विकास में बीबर नामक पत्रिका का बहुत महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है जिसका प्रकाशन आज से लगभग 100 वर्ष पहले, सन 1924 में शुरू हुआ था। उसके संपादक श्री सतीश चन्द्र बसुमतारी ने उस पत्रिका के माध्यम से बोडो समाज, भाषा और साहित्य में एक नई जागृति उत्पन्न की थी।

देवियो और सज्जनो,

श्री मदाराम ब्रह्मा ने बोडो नाटक और कविता के साथ-साथ शिक्षा और समाज सुधार के क्षेत्र में अपनी छाप छोड़ी। पद्मश्री का सम्मान प्राप्त करने वाले बोडो समुदाय के प्रथम व्यक्ति के रूप में उनका विशेष स्थान है। साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित श्री बृजेन्द्र कुमार ब्रह्मा, ‘बोडो साहित्य सभा के अध्यक्ष भी रहे हैं। प्रखर सामाजिक चेतना से युक्त साहित्य की रचना करने वाले तथाबोडो साहित्य सभा के पूर्व अध्यक्ष डॉक्टर कामेश्वर ब्रह्मा को सन् 2016 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। सन् 2005 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित डॉक्टर मंगल सिंह हाज़ोवरी को वर्ष 2021 के लिए पद्मश्री से अलंकृत करने का सुअवसर मुझे प्राप्त हुआ था। इस संदर्भ में, मैं यह भी कहना चाहूंगा कि मंगलसिंह हाज़ोवरी और नील कमल ब्रह्मा जैसे अनेक बोडो रचनाकारों ने पर्यावरण को बचाने की चिंता से प्रेरित रचनाएं की हैं। मानवता के समक्ष उपस्थित ऐसी गंभीर चुनौती के विषय पर लेखन करना बोडो साहित्य की प्रासंगिकता का प्रभावशाली उदाहरण है। बोडो साहित्य को अनेक रचनाकारों ने समृद्ध किया है जिनमें से, समय के अभाव के कारण,कुछ नामों का ही उल्लेख मैंने किया है।

बोडो और असमिया भाषाओं और संस्कृतियों के बीच सौहार्द के उदाहरण के रूप में मैं श्री सीतानाथ ब्रह्मा चौधरी का उल्लेख करना चाहूंगा। वे बोडो और असमिया, दोनों ही भाषाओं में उत्कृष्ट लेखन करते थे। वे असम साहित्य सभा के अध्यक्ष चुने गए थे। यही नहीं, उनके नाम पर असम साहित्य सभा द्वारा सीतानाथ ब्रह्मा चौधरी पुरस्कार दिया जाता है। बोडो अस्मिता तथा अन्य समुदायों के साथ सौहार्दपूर्ण सह-अस्तित्व का आदर्श सीतानाथ ब्रह्मा चौधरी के जीवन और कृतियों में देखा जा सकता है।

बोडो भाषा की रचनाओं के आधार पर अब तक 17 रचनाकारों को साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किए गए हैं। मैंने देखा कि उनमें 10 पुरस्कार कविता की पुस्तकों के आधार पर दिए गए हैं। इससे बोडो रचनाकारों में कविता के प्रति स्वाभाविक रुझान का अनुमान होता है। मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई है कि अनेक महिलाएं बोडो साहित्य की विभिन्न विधाओं में साहित्य सृजन कर रही हैं। लेकिन यह भी देखने में आया है कि मौलिक रचनाओं के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त करने वाले वरिष्ठ रचनाकारों में केवल दो महिलाओं का नाम है। मैं चाहता हूं कि महिला रचनाकारों को राष्ट्रीय स्तर पर और अधिक मान्यता प्राप्त हो। मैं चाहूंगा किबोडो साहित्य सभा द्वारा महिला रचनाकारों को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष प्रयास किया जाए।

किसी भी साहित्य को जीवन्त और प्रासंगिक बनाए रखने के लिए युवा पीढ़ी की भागीदारी अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। अत: बोडो साहित्य सभा द्वारा युवा रचनाकारों को भी विशेष प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए।

देवियो और सज्जनो,

बोडो भाषा को संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल करने हेतु संविधान संशोधन वर्ष 2003 में हुआ और उसकी घोषणा जनवरी 2004 में की गई। उस समय भारत-रत्न श्रद्धेय श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी देश के प्रधानमंत्री थे। कवि हृदय वाजपेयी जी के व्यक्तित्व में भाषा, साहित्य और संवेदना के प्रति अनुराग झलकता था। आज के इस महत्वपूर्ण समारोह के अवसर पर मैं उनकी स्मृति को नमन करता हूं।

बोडो साहित्य सभा के उद्देश्यों और लक्ष्यों में मातृभाषा के जरिए शिक्षा प्रदान करने पर भी ज़ोर दिया गया है। आपकी सभा का यह उद्देश्य राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में निहित मूलभूत सिद्धांतों के अनुरूप है। इस शिक्षा नीति में भी मातृभाषा को शिक्षा के माध्यम के रूप में अपनाए जाने की सिफारिश की गई है।

मुझे यह जानकर भी बहुत प्रसन्नता हुई है कि बोडो भाषा में अन्य भाषाओं की रचनाओं का अनुवाद बड़े उत्साह के साथ किया जा रहा है। यह किसी भी जीवंत साहित्यिक समुदाय की पहचान है। मुझे विश्वास है कि ऐसे अनूदित साहित्य से बोडो भाषा के पाठकों को अन्य भारतीय भाषाओं के साथ-साथ विश्व साहित्य से परिचित होने का अवसर मिलेगा।

मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई है कि साहित्य अकादमी, संगीत नाटक अकादमी , ललित कला अकादमी,केंद्रीय हिन्दी निदेशालय , भारतीय भाषा संस्थान तथा वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग जैसे केंद्र सरकार के संस्थान बोडो भाषा के प्रसार में अपना योगदान दे रहे हैं।

स्थानीय भाषाओं का संरक्षण और प्रचार-प्रसार समाज और सरकार की ज़िम्मेदारी है। अतः मैं चाहूँगा कि असम की सरकार बोडो भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए प्रयास करे।

अंत में मैं बोडो भाषा से जुड़े सभी लोगों को यह शुभकामना देता हूं कि बोडो भाषा खूब फले-फूले - बोरो राव गेवलान्थों।

धन्यवाद,

जय हिन्द!