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भारत के राष्ट्रपति, श्री राम नाथ कोविन्द का हिमाचल प्रदेश केन्द्रीय विश्वविद्यालय, धर्मशाला के छठे दीक्षांत समारोह के अवसर पर संबोधन

धर्मशाला :10.06.2022

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देव-भूमि हिमाचल प्रदेश में प्राकृतिक सौंदर्य, अध्यात्म एवं शिक्षा के नगर धर्मशाला में संचालित, हिमाचल प्रदेश केन्द्रीय विश्वविद्यालय के छठे दीक्षांत समारोह में आकर, मुझे बहुत प्रसन्नता हो रही है।

हिमाचल प्रदेश की यह धरती तिरंगे के लिए जान न्योछावर कर देने वाले बलिदानियों की धरती है। धर्म अर्थात कर्तव्य का स्थान धर्मशाला,शक्तिपीठों तथा आध्यात्मिक केन्द्रों की भी स्थली है। इस पावन भूमि को मैं नमन करता हूं।

हिमाचल प्रदेश के साथ मेरा नाता पिछले लगभग 48 वर्ष से है। मुझे याद है, पहली बार, मैं वर्ष 1974 में, हिमाचल प्रदेश आया था। और उसके बाद, यहां का प्राकृतिक सौन्दर्य तथा स्नेही लोग मुझे बार-बार आकर्षित करते रहे हैं।

देवियो और सज्जनो,

हिमाचल प्रदेश केन्द्रीय विश्‍वविद्यालय ने, राष्‍ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की अनुशंसाओं के अनुसार, अनेक प्रणालियों को लागू करने की पहल की है। मैं समझता हूं कि इस प्रकार की पहल से, विद्यार्थियों में नवीन कौशल, ज्ञान और क्षमताओं का विकास होगा तथा वे स्‍वावलम्‍बन तथा ‘राष्‍ट्र सर्वोपरि’ की भावना के साथ जीवन में आगे बढ़ेंगे।

मुझे विश्वास है कि राज्यपाल श्री राजेन्द्र आर्लेकर जैसे कर्मठ विद्वान और मुख्यमंत्री श्री जय राम ठाकुर के सक्षम नेतृत्व से, हिमाचल प्रदेश तथा यहां के सभी शिक्षण संस्थान, विकास पथ पर निरंतर अग्रसर रहेंगे।

हिमाचल प्रदेश के ही निवासी, श्री अनुराग ठाकुर जी के प्रयासों से देश के युवाओं के हित में जो कदम उठाए जा रहे हैं उनका लाभ हिमाचल प्रदेश के युवाओं को भी मिल रहा है। इस विश्वविद्यालय को श्री हर-महेन्द्र सिंह बेदी जैसे योग्य कुलाधिपति का मार्गदर्शन प्राप्त हो रहा है। इसी वर्ष, उन्हें राष्ट्रपति भवन में पद्मश्री से सम्मानित करने का अवसर मुझे प्राप्त हुआ था। विश्वविद्यालय के कुलपति के नेतृत्व में यह संस्थान आगे बढ़ रहा है।

इस तथ्य पर हिमाचल प्रदेश के सभी निवासी गर्व का अनुभव कर सकते हैं कि नीति आयोग द्वारा जारी किए गए एस.डी.जी. इंडेक्स 2020-21 के अनुसार, उच्चतर माध्यमिक स्तर पर G.E.R.की दृष्टि से हिमाचल प्रदेश का देश में सर्वोच्च स्थान है और क्वालिटी एजुकेशन के मानक पर प्रदेश का भारत में दूसरा स्थान है।

देवियो और सज्जनो,

हमारी राष्ट्रीय शिक्षा नीति में मातृ-भाषाओं के संरक्षण और विकास पर विशेष बल दिया गया है। हिमाचल प्रदेश में भी अनेक स्थानीय भाषाएं और बोलियां हैं। हिमाचल प्रदेश में सराइकी भाषा के लिए सराहनीय कार्य करने वाले भाषा-सेवी श्री विद्यानंद सराइक को इसी वर्ष राष्ट्रपति भवन में पद्मश्री से सम्मानित करके मुझे हर्ष का अनुभव हुआ था।

देवियो और सज्जनो,

अभी इस संस्थान की स्थापना के मात्र 12 वर्ष पूरे हुए हैं। विश्वविद्यालय के आरंभिक वर्षों के विद्यार्थीगण अब विभिन्न क्षेत्रों में अपनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभा रहे होंगे। यह उपयुक्त समय है कि विश्वविद्यालय का एलूमनाई एसोसिएशन सक्रिय हो और उसका वार्षिक या दो वर्षों में एक बार get-together भी आयोजित हुआ करे। किसी भी संस्थान के पूर्व विद्यार्थीगण अपने संस्थान के लिए विशेष लगाव महसूस करते हैं। इस भावना को संस्थान के लिए उपयोगी स्वरूप प्रदान करने में एलूमनाई एसोसिएशन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

प्रिय शिक्षकगण,

हमारी परंपरा में कहा गया है कि –

अन्नदानम् परम् दानम्, विद्यादानम् अत: परम्।

अन्नेन क्षणिका तृप्ति:, यावज्जीवम् च विद्यया।।

अर्थात्

अन्न दान परम दान है, औरविद्या का दान उससे भी बड़ा है क्योंकि अन्न से क्षण भर की तृप्ति होती है जबकि विद्या से आजीवन तृप्ति बनी रहती है।

शिक्षा, किसी भी देश के निर्माण की आधारशिला होती है। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए, जो विद्यार्थी के अंदर बौद्धिकता और कौशल का तो विकास करे ही, उसके नैतिक-बल और चरित्र-बल को भी मजबूत बनाए। मुझे विश्वास है कि हमारे शिक्षक गण, ऐसी शिक्षा प्रदान करने का अपना दायित्व जिम्मेदारी से निभाते रहेंगे।

मेरे प्यारे विद्यार्थियो,

जो भी देश विश्‍व में अग्रणी रहे हैं, उनकी उन्नति में युवाओं की महती भूमिका रही है। साथ ही, शिक्षा के क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी किसी भी समाज के विकास का महत्वपूर्ण मानक होता है। मुझे यह जानकर बहुत प्रसन्नता हुई है कि आज के पदक विजेताओं में बेटियों की संख्‍या बेटों की तुलना में दोगुनी है। यह हर्ष का विषय है। अभी हाल में ही आए सिविल सर्विसेस परीक्षा में पहले तीन स्थान हमारी बेटियों ने हासिल किए हैं। इससे यह भी अनुमान होता है कि समान अवसर मिलने पर हमारी बेटियों की उपलब्धियां बेटों की तुलना में कहीं अधिक होती हैं। इस तथ्य में हमारे देश व समाज के विकसित स्वरूप की झलक भी दिखाई देती है।

आप जैसे युवाओं के सामने अनेक क्षेत्रों में आगे बढ़ने के अवसर उपलब्ध हैं। इन अवसरों का उपयोग करने की क्षमता भारत की युवा शक्ति के पास है। जरूरत इस बात की है कि आप सब अपनी योग्यता पर विश्वास रखते हुए मजबूत क़दमों से आगे बढ़ें।

प्रिय विद्यार्थियो,

यह दीक्षांत समारोह आपकी दीक्षा पूरा होने का अवसर है, लेकिन आपकी शिक्षा तो जीवन पर्यंत चलती रहेगी। आप सबको हर किसी से, हर क़दम पर शिक्षा लेने के लिए तत्पर रहना चाहिए। अभी लगभग 15 दिन पहले, पुणे में मुझे भगवान दत्तात्रेय मंदिर से जुड़े एक कार्यक्रम में शामिल होने का अवसर प्राप्त हुआ था। कहा जाता है कि भगवान दत्तात्रेय के 24 गुरु थे। उन्होंने पृथ्वी से लेकर छोटे बालक तक से कुछ न कुछ सीखा। पृथ्वी से उन्होंने, सहनशीलता व परोपकार की भावना सीखीऔर समुद्र से सीखा कि जीवन के उतार-चढ़ाव में भी गतिशील रहना चाहिए। छोटे बालक से उन्होंने प्रसन्न रहना सीखा और भौंरे से यह शिक्षा ली कि जहां भी सार्थक बात सीखने को मिले, उसे तत्काल ग्रहण कर लेना चाहिए। इसलिए, आपको भी सदैव सीखने का उत्साह बनाए रखना है।

आपको यह भी ध्यान रखना है कि जो उपलब्धियां आपने अभी तक प्राप्त की हैं, उनमें किसी न किसी रूप में समाज का भी योगदान रहा है। यह, समाज का आपके ऊपर ऋण है। इसे चुकाने के लिए आपको हर तरह से तैयार रहना चाहिए। इसे आप कैसे चुकाते हैं, कब चुकाते हैं, यह मैं आप सबके विवेक पर छोड़ता हूं। मुझे भारत की शिक्षित, अनुशासित एवं संकल्पशील युवा-शक्ति के विवेक पर पूरा भरोसा है।

मुझे विश्वास है कि राष्ट्र निर्माण की जिम्मेदारी को पूरा करने की शक्ति और संकल्प आप के अंदर विद्यमान है। भारत को प्रगति के नए सोपान तय करने हैं। अब, जब हमारे पांव मजबूती से अपनी आधार-भूमि पर जम गए हैं तब, अपनी परंपरा एवं ज्ञान से बल प्राप्त करते हुए, भारत को विश्व में अपना विशेष स्थान बनाना है और जल्दी बनाना है।

इसमें संदेह नहीं कि लक्ष्य बड़ा है, कठिन भी है। लेकिन, बड़े व कठिन लक्ष्यों को प्राप्त करना ही पुरुषार्थ है।

पूरे आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ते हुए आप सब अपने संकल्पों को सिद्ध करें, यही मेरी मंगल-कामना है।

धन्‍यवाद,

जय हिन्‍द।