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भारत के राष्‍ट्रपति, श्री राम नाथ कोविन्‍द का शिक्षक दिवस समारोह में सम्‍बोधन

नई दिल्ली : 05.09.2019

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1. भारत-रत्न से सम्मानित, हमारे देश के पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर राधाकृष्णन एक महान दार्शनिक, स्टेट्समैन, राजनीति-विद और लेखक थे। लेकिन, इन सबसे बढ़कर, वे एक असाधारण शिक्षक भी थे। विद्यार्थियों के हृदय में उनके लिए प्रेम और आदर की गहरी भावना रही है। शिक्षक के रूप में उनके योगदान से सभी भारतवासियों को, विशेषकर शिक्षकों, को एक विशेष प्रेरणा मिलती है। जैसे आप सब उनसे अपने को सम्बंधित मानकर गौरवान्वित महसूस करते हैं उसी प्रकार मैं भी उन्हें अपना Predecessor कहकर गौरवान्वित होता हूँ।

2. ऐसे असाधारण शिक्षक की जयंती के अवसर पर राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त करने वाले आप सभी शिक्षकों को मैं हार्दिक बधाई देता हूं। इस पुरस्कार के माध्यम से, विद्यार्थियों की प्रतिभा को सँवारने और उनके भविष्य को बनाने में आपकी प्रतिबद्धता और उत्कृष्ट योगदान का सम्मान किया गया है।

3. आप सभी शिक्षकों के बीच आकर आज मुझे भी अपने अध्यापकों का स्मरण हो रहा है। इसी वर्ष फरवरी में मुझे कानपुर में अपने विद्यालय जाकर अपने वयोवृद्ध शिक्षकों का आशीर्वाद पाने का सुअवसर मिला। उन जैसे शिक्षकों के स्नेह और मार्गदर्शन के बल पर ही मैं अपनी जीवन-यात्रा में यहां तक पहुंच सका हूं।

देवियो और सज्जनो,

4. माता-पिता अपने बच्चे को शिक्षकों के हाथ में बड़े विश्वास के साथ सौंपते हैं। मैं मानता हूं कि विद्यार्थियों के हृदय में भी शिक्षकों का स्थान उनके अपने माता-पिता के बराबर का ही होता है। हमारी प्राचीन परंपरा में तो गुरु का स्थान सबसे ऊपर माना गया है। शिक्षकों के प्रति आदर का यह भाव भारतीय शिक्षा पद्धति का आधार रहा है।

5. ज्ञान और कौशल तो बाद में भी प्राप्त किए जा सकते हैं, लेकिन चरित्र-निर्माण की मजबूत नींव स्कूलों और विद्यालयों में ही डाली जाती है। शिक्षक का मुख्य उद्देश्य है – विद्यार्थी को अच्छा इंसान बनाना। अच्छे इंसान का निर्माण करने के लिए शिक्षकों द्वारा विद्यार्थियों में ईमानदारी, अनुशासन, प्रामाणिकता और सत्यनिष्ठा यानि honesty, discipline और integrity का संचार करना होता है। इन जीवन-मूल्यों से सम्पन्न अच्छा इंसान समाज के हर क्षेत्र में अच्छा सिद्ध होगा। यदि वह डॉक्टर बनेगा तो अच्छा डॉक्टर सिद्ध होगा। इसी तरह वह अच्छा वकील, अध्यापक, कर्मचारी या व्यापारी बनेगा। ऐसे अच्छे इंसान अपने परिवार के लिए अच्छे माता-पिता, पुत्र-पुत्री, भाई-बहन और पति-पत्नी सिद्ध होते हैं। अंततोगत्वा वे देश के श्रेष्ठतम नागरिक के रूप में अपना योगदान देते हैं। इस प्रकार, अच्छे इंसान बनाकर, आप सभी शिक्षक-गण राष्ट्र-निर्माण में भागीदार बनते हैं।

देवियो और सज्जनो,

6. स्वामी विवेकानंद ने शिक्षा के लगभग सभी पक्षों पर अपने श्रेष्ठ विचार व्यक्त किए हैं जिनकी प्रासंगिकता हर युग में बनी रहेगी। उन्होंने शिक्षा को मानव-निर्माण की प्रक्रिया के रूप में परिभाषित करते हुए कहा था कि शिक्षा का लक्ष्य ‘Man Making Education’ होना चाहिए। स्वामी जी के विचारों को विस्तार देते हुए, मेरा कहना है कि संवेदनशील और श्रेष्ठ मानव के निर्माण वाली शिक्षा आज के विश्व की बदलती हुई परिस्थितियों में और भी उपयोगी सिद्ध होगी।

7. डॉक्टर राधाकृष्णन कहा करते थे कि अच्छा शिक्षक वह है जो जीवन भर विद्यार्थी बना रहता है। शिक्षक किताबों से ही नहीं, विद्यार्थियों से भी सीखता है।

8. भारत भूमि ने अनेक उच्च-श्रेणी के शिक्षक दिए हैं। हम सभी जानते हैं कि लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व चन्द्रगुप्त के साथ मिलकर, विशाल मौर्य साम्राज्य की स्थापना करने वाले विष्णुगुप्त चाणक्य ने नैतिक आदर्शों पर आधारित राज्य की स्थापना के अपने अभियान के पहले, तक्षशिला विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त की थी। बाद में अपनी प्रतिभा के बल पर वे उसी विश्वविद्यालय में प्राचार्य और कुलपति बने। आचार्य चाणक्य ने देश के युवाओं में सदाचार, त्याग, पुरुषार्थ और देश-प्रेम की भावना का संचार किया। एक गरीब परिवार के बच्चे, चन्द्रगुप्त की क्षमताओं को पहचान कर आचार्य चाणक्य ने उसे अपना शिष्य बनाया तथा उसकी प्रतिभा को ऐसा निखारा कि वे आज विश्व इतिहास के महानतम सम्राटों में गिने जाते हैं। आचार्य चाणक्य का निजी जीवन भी महान आदर्शों का जीवंत उदाहरण था। एक शिक्षक के रूप में चाणक्य का योगदान सबके लिए अनुकरणीय है, विशेषकर आप सभी शिक्षक समुदाय के लिए।

9. आचार्य चाणक्य सम्राट चन्द्रगुप्त के प्रधानमंत्री थे। उस समय प्रधानमंत्री को महामात्य कहा जाता था। ऐसा उल्लेख मिलता है कि एक राजदूत महामात्य चाणक्य से राजकीय कार्य से मिलने आए। महामात्य की कुटिया में दो दीपक रखे हुए थे जिनमें से एक दीपक जल रहा था। उस राजदूत के कुटिया में पधारने के बाद चाणक्य ने उस जलते हुए दीपक को बुझाकर, दूसरा दीपक जलाया और परस्पर चर्चा करते रहे। उनसे विदा लेते समय राजदूत ने दो अलग-अलग दीपकों के उपयोग करने का कारण पूछा। चाणक्य ने समझाया कि जिस दीपक में राजकोष के पैसे से तेल भरा जाता है उसका उपयोग वे केवल राज-काज के काम के समय करते हैं। अन्यथा वे अपने निजी पैसे से खरीदे हुए तेल वाला दीपक ही जलाते हैं।


उस राजदूत ने कहा कि जिस साम्राज्य के शासकों में नैतिकता की जड़ें इतनी मजबूत हैं उसका सशक्त होना स्वाभाविक है। और, उस साम्राज्य को विश्व में कोई परास्त नहीं कर सकता।

देवियो और सज्जनो,

10. आज हमारे पास ज्ञान का एक विशाल भंडार उपलब्ध है जो आगे भी बढ़ता ही जाएगा। आज विश्व ‘सूचना युग’ से ‘ज्ञान युग’ यानि ‘knowledge society’ में प्रवेश कर रहा है। लेकिन, केवल ज्ञान पर ही आश्रित रहने से मानव-समाज की सुरक्षा सुनिश्चित करना संभव नहीं होगा। ज्ञान के साथ-साथ विवेक का होना भी अनिवार्य है। विवेक-सम्मत ज्ञान ही मानवीय समस्याओं का समाधान कर सकता है। इसीलिए वैश्वीकरण और स्पर्धा के इस दौर में भी हमें ‘artificial intelligence’ और ‘human compassion’ का समन्वय करना है। हमें ‘digital learning’ और ‘character building’ में सामंजस्य बनाना है। ऐसे विवेकपूर्ण ज्ञान के आधार पर ही हम सब, जलवायु परिवर्तन या climate change, प्राकृतिक जल-स्रोतों और जंगलों में हो रही कमी, जीवधारियों की अनेक प्रजातियों के लुप्त होने के संकट, पिघलते ग्लेशियर, जहरीली हवा व खाद्य पदार्थों से जुड़ी समस्याओं का समाधान कर सकते हैं। इसी प्रकार, विद्यार्थियों को बूंद-बूंद पानी बचाने की सीख देकर हमारे शिक्षक-गण जल-संरक्षण के राष्ट्रीय अभियान में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। विवेक के बल पर ही, समाज के हर क्षेत्र में हो रहे व्यवसायीकरण एवं जीवन-मूल्यों में गिरावट के कारण उत्पन्न चुनौतियों का हम सब सामना कर सकते हैं।

11. अतः आप सभी शिक्षकों के लिए मेरा सुझाव होगा कि आप सब अपनी मौलिक ज़िम्मेदारी के महत्व को रेखांकित करते हुए एक ऐसी नई पीढ़ी का निर्माण करें जो ज्ञान और विवेक के सामंजस्य से परिपूर्ण हो ताकि वह आज की सभी चुनौतियों का सफलतापूर्वक समाधान कर सके। यही हमारे शिक्षक होने की सार्थकता है। यही सच्चे अर्थों में ‘शिक्षक दिवस’ की प्रामाणिकता है और यही डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी को श्रेष्ठतम नमन करने का सुअवसर भी है।

12. मैं एक बार फिर आज के पुरस्कार विजेताओं को बधाई देता हूं और विद्यार्थियों के लिए उनकी प्रतिबद्धता की सराहना करता हूं। इस अवसर पर मैं देश के सभी शिक्षकों को शुभकामनाएं भी देता हूं।

धन्यवाद

जय हिन्द!