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"लॉ, जस्टिस एंड ज्युडिशियल पॉवर- जस्टिस पीएन भगवती’ज़ एप्रोच" पुस्तक के लोकार्पण के अवसर पर भारत के राष्ट्रपति, श्री राम नाथ कोविन्द का सम्बोधन

राष्ट्रपति भवन : 08.02.2019

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1. मुझे यहां आकर और "लॉ, जस्टिस एंड ज्युडिशियल पॉवर - जस्टिस पी.एन. भगवती’ज़ एप्रोच" पुस्तक की पहली प्रति प्राप्त करने पर बहुत प्रसन्नता हो रही है। यह पुस्तक दिवंगत न्यायधीश पी.एन. भगवती के जीवन और कार्य - तथा न्याय के लिए उनके दृष्टिकोण पर लिखे गए निबंधों का संग्रह है। मैं इस पुस्‍तक के संपादक और विभिन्न योगदान कर्ताओं को बधाई देता हूं। यह पुस्तक वास्तव में हमारी पीढ़ी के सबसे निपुण न्यायविदों और भारत के सर्वाधिक स्‍मरणीय मुख्य न्यायाधीशों में से एक, जस्टिस पी.एन. भगवती के प्रति सर्वथा योग्‍य और सुविचारित श्रद्धांजलि है।

2. न्यायमूर्ति भगवती, एक न्यायाधीश और विधिवेत्‍ता से कहीं बढ़कर थे। वह न्याय के और न्याय चाहने वालों के मित्र थे और स्वयं में एक संस्था थे। भारत के मुख्य न्यायाधीश के रूप में अपना कार्यकाल पूरा करने तक वे गुजरात उच्च न्यायालय में 13 वर्ष और उच्चतम न्यायालय में 13 वर्ष तक न्‍यायाधीश रहे और अपने कुल 26 वर्षों के दौरान उन्होंने इस क्षेत्र में प्रभूत योगदान दिया। इन योगदानों के माध्यम से उन्होंने ज्‍यादा संवेदनशील न्यायिक प्रणाली के निर्माण और बेहतर, निष्पक्षतर भारत के निर्माण में मदद की।

3. न्यायमूर्ति भगवती ने न्याय की अवधारणा का विस्तार करने और न्याय को आम लोगों के लिए अधिक सुलभ बनाने का कार्य किया। यह मानवतावादी दर्शन कानून और न्यायिक दायित्‍व की सर्वश्रेष्ठ परंपराओं के अनुरूप था। वह प्रख्यात न्यायविदों की एक ऐसी पीढ़ी के प्रतिनिधि थे जिन्होंने भारत जैसे विकासशील लोकतंत्र में न्यायपालिका की भूमिका की पुनर्कल्पना की। यह एक ऐसा दौर था जब न्यायपालिका ने समझ लिया कि एक न्यायाधीश की असल न्यायिक भूमिका बंधे-बंधाए ढर्रे पर न्‍याय-निर्णयन की सीमाओं से ऊपर उठकर खुद को गरीबों और शोषितों के मित्र और संरक्षक के रूप में स्थापित करने की है।

4. न्यायमूर्ति भगवती न्यायपालिका में इस रोमांचक दौर का हिस्सा थे। आपातकाल के दौरान सीखे गए सबकों के बाद, न्‍यायपालिका ने हमारे संविधान में निहित, मानव अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रता के पालन पर ध्यान केंद्रित किया। इसने ऐसी पर्यावरण अनुकूल व्‍यवस्‍था तैयार करने में मदद की, जो जलवायु परिवर्तन के विकट संकट बनने से कहीं पहले, औद्योगिक प्रदूषण और पारिस्थितिकीय अपकर्ष के विरुद्ध काम करने लगी थी। इससे लंबे समय से मुक़दमा झेल रहे ऐसे विचाराधीन कैदियों को राहत मिली, जिन्हें उनके मामले में निर्णय हो जाने पर दोषी ठहराए गए होने पर सुनाई जाने वाली सजा से ज्‍यादा अविध पहले ही जेल में बिता चुके थे। इसी दौर में, कानूनी सहायता के अधिकार और लोक-अदालत की संस्था को बढ़ावा देकर मिला जिससे न्‍याय की परिभाषा को विस्तार मिला।

5. ऐसा अकारण नहीं है कि न्यायमूर्ति भगवती को भारत में जनहित याचिका का जनक कहा जाता है। किसी पोस्टकार्ड पर भी दायर याचिका का संज्ञान लेने वाले देश के सर्वोच्च न्यायालय की आदर्शवादिता और सादगी सराहनीय है। इस प्रथा के दूरगामी प्रभाव पड़े। इसने लोकस स्‍टैंडाइ (अधिस्थिति) की संकीर्ण परिभाषा से अदालतों को बाहर निकाला और न्‍याय से वंचित नागरिक की ओर से उसके किसी मित्र को, अथवा किसी अन्‍य संबंधित व्‍यक्ति या सस्‍था को अदालत से संपर्क करने की अनुमति दी। आने वाले कुछ ही समय में, इसने ऐसी याचिकाओं से निपटने में न्‍याय मित्र की महत्‍वपूर्ण भूमिका निभा दी।

6. जनहित याचिका की परंपरा, विधि के पेशे और न्याय संदाय की प्रक्रिया में भारत का योगदान है। अन्य लोकतांत्रिक देशों और अन्य कानूनी तंत्रों ने भी इसकी प्रशंसा की है। हाँ, ऐसे उदाहरण भी देखने में आते हैं जहां पेशेवर जनहित याचिकाकर्ता अपने निहित स्वार्थों के लिए ऐसे प्रावधानों का दुरुपयोग कर सकते हैं या विधि-सम्‍मत निर्णय प्रक्रिया में बाधा डाल सकते हैं।मुझे ख़ुशी है कि न्‍यायपालिका ऐसे प्रयासों के साथ सावधानी से निपट रही है।हालांकि, व्यापक परिदृश्य में देखें तो जनहित याचिका जैसे तंत्र का महत्‍व और सेवाएं बहुत शिक्षाप्रद हैं। इसके लिए, हम न्यायमूर्ति भगवती के आभारी हैं।

देवियो और सज्जनो,

7. न्याय की प्रक्रिया न तो स्‍वयं में संपूर्ण है और न ही स्थिर है। न्याय की परिभाषा के साथ-साथ न्‍याय के मार्ग का उद्भव और विकास मानव इतिहास की लंबी परंपराओं के साथ ही हुआ है। तीन दशक से भी अधिक समय पहले, न्यायमूर्ति भगवती और उनकी पीढ़ी के न्यायविदों ने न्याय के क्षितिज का विस्‍तार किया। आज, हमारे विकास के इस चरण में, सामाजिक और आर्थिक न्याय तथा जलवायु और प्रौद्योगिकी सम्बन्धी न्याय की प्राप्ति में नए प्रकार की चुनौतियाँ सामने आई हैं।

8. जैसे-जैसे हमारे समाज में लोकतंत्र का आधार मजबूत हुआ है, न्याय के बुनियादी ढांचे और दृष्टिकोण ने इसके साथ अपनी गति बनाए रखी है और यह गति आगे भी बनी रहनी चाहिए। हमारे लोगों के बीच लोकतंत्र, समान पहुंच और समतावाद की निरंतर मजबूत मांग की झलक शासन की संस्थाओं में पर्याप्त रूप से मिलती रहनी चाहिए।

9. यह याद रखा जाना चाहिए कि जनहित याचिका की अवधारणा गरीबों और उन लोगों के लिए एक साधन के रूप में शुरू हुई जो मुकदमेबाजी की लंबी प्रक्रिया का खर्च वहन नहीं कर सकते थे। न्यायमूर्ति भगवती ने स्वयं इसे "इक्वल जस्टिस इन एक्शन" की संज्ञा दी। इस तरह के प्रश्न आज भी प्रासंगिक हैं। मुकदमेबाजी की फीस से संपन्न और असम्पन्न तथा इस भारी खर्च का वहन कर करने और न कर सकने वाले पक्षकारों के बीच विभाजन पैदा नहीं होना चाहिए। यह बेंच और बार के लिए एक जरूरी मुद्दा है कि वे इन पर विचार करें और इसके समाधान में मदद करें।

10. इसी प्रकार, और जैसा कि मैंने पहले के अवसरों में भी उल्लेख किया है, जब न्यायपालिका बार-बार होने वाले स्थगन को रोकने का समाधान खोजने का प्रयास करती है, तो इससे न्याय की परिकल्पना का विस्तार होता है। आखिरकार, मामलों में केवल विलम्ब कराने के लिए अक्सर होने वाले स्थगन से असुविधा तो होती ही है, साथ ही यह गरीब और कम-संपन्न पक्षकारों पर न्याय-कर की तरह भी है।

11. इसी प्रकार, क्षेत्रीय भाषाओं में अदालती फैसलों की प्रमाणित अनूदित प्रतियां प्रदान करने की सुविधा उन वादियों के लिए वरदान है, जो अंग्रेजी भाषा में सहज महसूस नहीं करते। मुझे खुशी है कि कुछ उच्च न्यायालयों ने इस संबंध में मेरा सुझाव माना है और अन्य उच्च न्यायालय भी इसे लागू करने की दिशा में काम कर रहे हैं। मैं भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों की प्रमाणित अनूदित प्रतियां, आरम्भ में हिन्दी में और फिर अन्य भारतीय भाषाओं में प्रदान करने के लिए किए गए प्रयास की भी सराहना करता हूं।

12. इन उपायों के पूरक के रूप में, मानव संसाधन के निरंतर उन्नयन पर ध्यान दिया जाना महत्वपूर्ण है। हमारी उच्च न्यायपालिका को विश्व स्तरीय गुणवत्ता वाली न्‍यायपालिका के रूप में मान्यता प्राप्त है। हमारी निचली न्यायपालिका को शायद कुछ क्षमता समर्थन की आवश्यकता है, और इसकी पहल न्यायपालिका से ही होनी चाहिए। प्रतिनिधित्‍व में भी, हमारी न्यायपालिका में हमारे राष्ट्र की विविधता और हमारे समाज की गहराई प्रतिबिम्बित करने का प्रयास करना चाहिए। इनसे न्यायमूर्ति भगवती और उनकी पीढ़ी के न्यायविदों के कार्यों और विचार-दर्शनों को आगे बढ़ावा मिलेगा - और हमारी स्वतंत्र न्यायपालिका, जिस पर हर भारतीय को गर्व है, की मजबूत परंपराओं की कीर्ति बढ़ेगी।

13. इन्हीं शब्दों के साथ, मैं एक बार पुनः इस पुस्‍तक के संपादक और लेखकों को बधाई देता हूं जिन्होंने हमें यह सुन्दर ग्रन्‍थ उपलब्ध कराया है। मैं कामना करता हूं कि पुस्तक को बड़ा पाठक वर्ग मिले और इसे सफलता प्राप्त हो।

धन्यवाद,

जय हिन्द!