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माता अमृता आनन्दमयी मठ द्वारा आयोजित विभिन्न कल्याण कार्यक्रमों की शुरूआत के अवसर पर भारत के राष्ट्रपति, श्री राम नाथ कोविन्द का संबोधन

कोल्लम : 08.10.2017

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राष्ट्रपति के रूप में कार्यभार संभालने के बाद केरल की यह मेरी पहली यात्रा है। दिल्ली से बाहर की मेरी पहली यात्रा हमारे देश के सुदूर उत्तर के लेह,लद्दाख,जम्मू और कश्मीर की थी। मैं वहां पर,उन सैनिकों से मिलने गया था जो अत्यंत मुश्किल हालातों में हमारी सीमाओं की रक्षा कर रहे हैं।

यह यात्रा हमारे देश के दक्षिण की ओर विपरीत छोर की यात्रा है। तथापि यह एक ऐसे राज्य की यात्रा भी है जिसने हमारी प्रकृति और हमारी संस्कृति को बचाने के लिए बहुत कुछ किया है। मैं केरल को हमारे देश के और हमारे सामूहिक समाज के लीडिंग स्प्रिचुअल दोस्त के रूप में उल्लेख करता हूं।

एक ओर सैनिकों की बहादुरी और दूसरी ओर हमारे आध्यात्मिक गुरुओं की करुणा और बौद्धता,दो ऐसे जुड़वा स्तंभ हैं जिन पर हमारी आशाएं टिकी हैं। ये हमारी सभ्यता को सुरक्षित रखते हैं। केरल में आध्यात्म की ज्योति बहुत ओजस्वी है और यह हजारों वर्ष पुरानी है। मैं आदि शंकराचार्य,श्री नारायण गुरु और अय्यनकाली जैसे गुरुओं का उल्लेख कर रहा हूं,उन्होंने हमारे देश को आध्यात्म की भावना से जोड़ने के लिए और अति आवश्यक समाज सुधार के लिए बहुत कुछ किया है।

केरल की आध्यात्मिक चेतना विश्वास और धार्मिक विशिष्टताओं से कहीं आगे है। यहां ईसाई समुदाय केवल भारत में ही सबसे पुराना नहीं है,बल्कि पूरे विश्व में सबसे पुराना है। भारत में सबसे पहले निर्मित किया गया मस्जिद केरला में है। मुझे बताया गया है कि इसे प्रोफेट के जीवन काल में सातवीं शताब्दी में अरब व्यापारियों द्वारा निर्मित किया गया था।

केरल की एक समृद्ध यहूदी विरासत भी है। मैं समझता हूं कि 2000 वर्ष पूर्व जब येरुसलेम से रोमन्स ने यहूदियों को बाहर कर दिया था तो यहूदी यहां आकर बस गए।

इन ऐतिहासिक घटनाओं से केरल में भिन्न-भिन्न विश्वास और धार्मिक समुदायों की परस्पर व्यवस्था और समझ की झलक मिलती है। यह एक ऐसा राज्य है जहां एक समुदाय ने दूसरे समाज को इच्छापूर्वक स्थान दिया है। यह इतिहास है कि हम भूल नहीं सकते और सीखते अवश्य हैं, और यह व्यवस्था और समझ ही है जो आध्यात्म का सार है।

माता अमृतानन्दमयी केरल की इस ज्ञानपूर्वक आध्यात्मिक परम्परा का प्रतिधित्व करती हैं। आदि शंकराचार्य अथवा अय्यनकाली,अम्मा अपने मिशन को राष्ट्र निर्माण में योगदान के रूप में देखती हैं। वह मानती हैं कि केवल सही रूप से आध्यात्मिक ही सबसे बड़ी दैविक सेवा और मुनष्य जाति की सेवा है। इसके अतिरिक्त मानव जाति की सेवा में,विशेषकर उनकी जो हमसे कमजोर है,उन्हें उनकी क्षमता उपलब्ध कराना, स्वास्थ्य और शिक्षा में उनकी क्षमता निर्मित करना है और यह सुनिश्चित करना है कि उन्हें समान अवसर मिले। अम्मा ने इन क्षेत्रों में ठोस रूप से कार्य किया है।

मुझे बताया गया है कि माता अमृतामयी मठ गरीब परिवार के पचास हजार से अधिक बच्चों को छात्रवृत्ति प्रदान कर रहा है। यह भारत के सर्वोत्तम विश्वविद्यालयों में एक-द अमृता विश्व विद्यापीठम का भी संचालन कर रहा है।

हाल ही में दिल्ली में एक कॉलेज समारोह को संबोधित करते हुए मैंने कहा था, ‘‘सही मायने में,पढ़े-लिखे वे नहीं हैं जो डिग्री एकत्र करते हैं,बल्कि वे हैं जो हमारे समाज में उन डिग्रियों और एक तरफ पड़ी हुई छात्रवृत्तियों का राष्ट्र निर्माता बनने के लिए सदुपयोग करते हैं।’’

मुझे यह जानकर अच्छा लगा कि अमृता यूनिवर्सिटी भी इसी फिलोस्फी पर कार्य कर रही है। जैसा कि अम्मा ने स्वयं कहा है‘‘आज,विश्वविद्यालय और उनके अनुसंधानकर्ताओं को रैंक मुख्यत: उनके द्वारा प्राप्त वित्त की राशि उनके द्वारा प्रकाशित किए गए पेपरों और मेधावी क्षमता के आधार मिलता है। परन्तु इसके साथ-साथ,हमें इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि हम समाज के निम्नतम और सबसे कमजोर वर्ग की सेवा के लिए उनके अनसंधान का कितना उपयोग कर पाए हैं।’’

मैं ऐसी सोच की बड़ी सराहना करता हूं। मैं अमृता इंस्टीट्यूट ऑफ मैडिकल साइंसेस एण्ड रिसर्च सेंटर और मठ द्वारा संचालित इंस्टीट्यू की भी सराहना करता हूं। मुझे बताया गया है कि पिछले दो दशकों में उन्होंने बिल्कुल मुफ्त चिकित्सा प्रदान की है जिसमें43 लाख मरीजों की सर्जरी भी शामिल है। यह एक बड़ी संख्या है। मैं दिल्ली के निकट फरीदाबाद में आरंभ होने वाले दूसरे अमृता इंस्टीट्यूट ऑफ मैडिकल साइंसेस की उम्मीद कर रहा हूं।

मित्रो, आध्यात्म हमें मानव चेतना की गुणवत्ता बढ़ाने और प्रत्येक मानव जाति के जीवन की गुणवत्ता बढ़ाने की चुनौती देता है। आज पहल की जाने वाली परियोजनाएं भी वही करती हैं। उनका उद्देश्य पूरे देश में 5,000 गावों में स्वच्छ पेय जल प्रदान करने का है। और वे गांवों को खुले में शौच से मुक्त बनाने के लिए संघर्ष करते हैं। ऐसी पहल लोगों और परिवारों के स्वास्थ्य और खुशहाली को बढ़ावा देती है। ऐसी पहल अम्मा द्वारा सम्मिलित केरल की आध्यात्मिकता और प्रगतिशील आदर्शों को प्रतिबिंबित करती है।

सबसे ऊपर ऐसी पहल एक बेहतर समाज और अधिक खुशहाल राष्ट्र का निर्माण करती है।

समापन से पहले, मैं आगामी वर्षों में मानवता की सेवा के लिए माता अमृतानन्दमयी के अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घजीवी होने की कामना करता हूं।


धन्यवाद !


जय हिन्द !