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लक्ष्मीपत सिंघानिया – आईआईएम लखनऊ नेशनल लीडरशिप अवार्ड प्रदान करने के अवसर पर भारत के राष्ट्रपति, श्री राम नाथ कोविन्द का संबोधन

नई दिल्ली : 09.12.2019

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1. 15वें ‘लक्ष्मीपत सिंघानिया – आईआईएम लखनऊ नेशनल लीडरशिप अवार्ड’ 2018 प्रदान किए जाने केअवसर पर आज सुबह आप सभी के बीच यहां आकर मुझे प्रसन्नता हो रही है। व्यापार, विज्ञान और प्रौद्योगिकी तथा सामुदायिक सेवा और सामाजिक उत्थान के तीन प्रमुख क्षेत्रों में असाधारण नेतृत्व को सम्मानित करने के लिए मैं ‘जेके ऑर्गेनाइजेशन’ और ‘भारतीय प्रबंधन संस्थान, लखनऊ’ को बधाई देता हूं।

2. वर्ष 2004 के बाद से अनेक प्रतिष्ठित भारतीय इस पुरस्कार से सम्मानित किए जा चुके हैं। ये अवार्ड उनकी नेतृत्व क्षमता और समाज में योगदान को मान्‍यता देते हैं। आज के पुरस्कार विजेताओं– डॉ. श्रीकुमार बनर्जी, डॉ. भूषण पुनानी, डॉ. अमित शर्मा, श्री अंशु गुप्ता और श्री पुनीत डालमिया – में से प्रत्‍येक ने अपनी उपलब्धियों से अपनी अलग पहचान बनाई है। मैं उन सभी को बधाई और शुभकामनाएं देता हूं।

3. ये पुरस्कार, एक दूरदर्शी और उत्कृष्ट उद्योगपति, लाला लक्ष्मीपत सिंघानिया के नाम पर आरम्भ किए गए हैं। संयोग से, लालाजी की कर्मभूमि कानपुर थी, जहां मैंने जन्म लिया और शिक्षा ग्रहण की। इस व्यवसायिक घराने की कानपुर के साथ सदा से जुड़ी सुखद स्मृतियों से मैं अभिभूत हो उठता हूं। अपनी उद्यमशीलता की भावना और व्यापार तथा समाज में योगदान के लिए लक्ष्मीपत जी विख्यात थे। देश के प्रमुख प्रबंधन संस्थानों में से एक, आईआईएम लखनऊ और जेके ऑर्गेनाइजेशन द्वारा एक साथ मिलकर इन पुरस्‍कारों की स्‍थापना किया जाना सर्वथा उपयुक्‍त ही है।

देवियो और सज्जनो,

4. हम लोग आज यहां नेतृत्व के क्षेत्र में उत्कृष्टता का सम्मान करने के लिए एकत्र हुए हैं। मैं सोचता हूं कि हमारे राष्ट्रपिता ये बढ़कर नेतृत्व का कोई बेहतर आदर्श उदाहरण हमारे सामने नहीं है। हम इस वर्ष गांधीजी की 150वीं जयंती मना रहे हैं। आज के पुरस्कार की श्रेणियों में से एक अर्थात्‘व्यवसाय’ से संबंधित उनके कुछ विचार मैं आपके साथ साझा करना चाहता हूं। गांधीजी ने स्वतंत्रता संग्राम में व्‍यापारिक क्षेत्र के शीर्ष लोगों की संभावित भूमिका को अच्‍छी तरह से समझ लिय था,और उनमें से अनेक व्यवसायियों को उन्‍होंने इस आन्दोलन का समर्थन करने के लिए प्रेरित किया। महात्मा से प्रेरित होकर, कई बड़े औद्योगिक घरानों ने राष्ट्र को अपने व्यावसायिक हितों से ऊपर वरीयता दी।

5. गांधीजी का मानना ​​था कि "सच्ची अर्थनीति वही है जो नैतिकता का पालन करे।" उन्होंने अर्थशास्‍त्र के ऐसे संस्करण का समर्थन किया, जिसमें नैतिक और भावनात्मक विचारों की अवहेलना न की जाती हो। एक ओर जहां उन्होंने धन के महत्व को समझा,वहीं उन्होंने व्‍यापार में नैतिकता और विश्वास के संयोजन पर भी निरंतर जोर दिया। दुर्लभ सरलता का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए, बॉम्बे के व्‍यवसायियों और व्यापारी वर्ग के समक्ष उन्होंने अपने मन की भावनाएं 1919 में अपने एक पत्रक में उजागर कीं। मैं उन्‍हीं के शब्‍दों को दुहराता हूं "दुनिया भर के महान आंदोलन अपनी सफलता के लिए काफी हद तक व्यापारी वर्ग पर निर्भर रहे हैं। सत्‍य ही हमारी सफलता का आधार है और यदि व्यापारिक मामलों में सत्‍य का बोलबाला है तो असत्य के अन्य किलों को चुटकियों में धराशायी किया जा सकता है।”

6. ये बातें व्यवसाय प्रबंधन के पाठों में भी उतनी ही शिक्षाप्रद हैं। अब नैतिकता, सच्चाई और विश्वास की पहचान व्यवसाय प्रबंधन के आवश्यक घटकों के रूप में बढ़ती जा रही है। यही कारण है कि पश्चिमी जगत के व्यापार और प्रबंधन नेतृत्व के महान विशेषज्ञ भी गांधीवादी दृष्टिकोण के महत्व को समझने के लिए आगे आ रहे हैं। दुनिया भर के शीर्ष प्रबंधन संस्थानों में, इस दृष्टिकोण की शाश्‍वत प्रासंगिकता को पाठ्यचर्या में अपनाया जा रहा है। यही कारण है कि प्रबंध अध्ययन को दिशा देने में अधिकतम लाभ कमाने के सिद्धांत की तुलना में नैतिकता पर बल देनेका दृढ़ प्रयास किया जाता है। बड़े वैश्विक व्‍यावसायिक प्रतिष्‍ठा पर यह आरोप लगता रहा है कि वे लोगों के हित की तुलना में लाभ को अधिक महत्व देते हैं। वैश्विक स्तर पर, हाल के दशकों में हमने देखा है कि जब व्यवसाय क्षेत्र निरंतर संकटों से जूझ रहा है, तब विशेषज्ञों ने मूल्य-आधारित व्‍यावसायिक नेतृत्व की आवश्यकता पर जोर देना शुरू कर दिया है। इसलिए व्यावसायिक अध्ययन के विद्वानों की मान्यता प्राप्त कृतियों में विश्वास तथा ईमानदारी और यहां तक ​​कि गांधीवादी प्रथाओं के संदर्भों को देखकर एक सुखद आश्चर्य होता है।

देवियो और सज्जनो,

7. स्वतंत्रता के बाद से, भारत ने राष्ट्रीय जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में शानदार प्रगति की है। अर्थव्यवस्था से लेकर विज्ञान और प्रौद्योगिकी तक, स्वास्थ्य-चर्या से लेकर शिक्षा तक, महिला सशक्तीकरण से लेकर सामाजिक न्याय तक-सभी क्षेत्रों में हमने प्रभूत प्रगति की है। दुनिया ने हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं, आर्थिक शक्ति, वैज्ञानिक कौशल, संस्कृति और विविधता का लोहा माना है। फिर भी, हमारे समक्ष अभी ऐसी बड़ी चुनौतियां मौजूद हैं, जिन पर ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है। हमें सामूहिक रूप से जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याओं का समाधान खोजने, समावेशी विकास के लिए कठोर प्रयास करने, उद्यमशीलता की संस्कृति विकसित करने, अपने प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा करने और समाज के सर्वाधिक कमजोर वर्गों के लिए न्याय सुनिश्चित करने की आवश्यकता है।

8. ये कोई साधारण चुनौतियां नहीं हैं, लेकिन हमने अपने मानकों को ऊंचा रखने का संकल्प दर्शाया है। विभिन्न क्षेत्रों में सही नेतृत्व के बल पर, हम किसी भी चुनौती का सामना कर सकते हैं। इस विचार को संस्कृत के एक सुभाषित में इतने सुन्दर तरीके से व्यक्त किया गया है कि इसे इसके मूल रूप में आपके समक्ष रखना ही सही है:

अमंत्रम् अक्षरम् नास्ति, नास्ति मूलम् अनौषधम्।

अयोग्य: पुरुषो नास्ति योजक: तत्र दुर्लभ:।।

इसका अर्थ है: जिस प्रकार ऐसा कोई शब्द नहीं जिससे किसी मंत्र की रचना न की जा सके; ऐसी कोई जड़ी-बूटी नहीं जिसका उपयोग किसी औषधि के रूप में न किया जा सके; उसी प्रकार ऐसा कोई भी मनुष्य नहीं; जो योग्य न हो; कमी है तो केवल इनके गुणों की पहचान कर इन्हें उपयोगी बनाने वाले मार्गदर्शक की, जो दुर्लभ होते हैं।

9. हम, अपने देश के भविष्य के लिए जिस बुनियाद का निर्माण करने जा रहे हैं, वह ‘नेतृत्व’ के धरातल पर टिकी होगी। हमारे देश के युवा अपने सामाजिक जीवन में और अपने द्वारा चुने जाने वाले पेशे में अग्रणी बनें इसके लिए हमें उन्हें प्रशिक्षित करने की आवश्यकता है। हम किस प्रकार से ऐसे बेहतर नेता तैयार करें जो कल देश को आगे बढ़ाएंगे। इस प्रश्न का एक ही उत्तर हो सकता है- शिक्षा। यहीं से आईआईएम, लखनऊ जैसे संस्थानों की अहम भूमिका शुरू होती है। पिछले 35 वर्षों में, यह न केवल प्रबंधन की शिक्षा के लिए बल्कि अनुसंधान और परामर्श सम्बन्धी गतिविधियों में भी अग्रणी संस्था के रूप में उभरा है। मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई कि यहाँ संचालित गतिविधियों में नेतृत्व विकास पर प्रमुखता से जोर दिया जाता है। कृषि, उद्यमिता, स्वास्थ्य प्रबंधन, शिक्षा, आईटी और ग्रामीण विकास के क्षेत्र में सामाजिक रूप से प्रासंगिक अनेक अनुसंधान और परामर्श परियोजनाएँ संचालित करने के लिए भी यह प्रतिबद्ध है।

10. शिक्षा के अलावा, हम विभिन्न क्षेत्रों में सर्वश्रेष्ठ अनुकरणीय व्यक्तियों की मिसाल पेश करके भविष्य के नेता तैयार करते हैं। ‘लक्ष्मीपत सिंघानिया-आईआईएम लखनऊ राष्ट्रीय नेतृत्व पुरस्कार’ का उद्देश्य भी यही है। आज के पुरस्कार उन लोगों को दिए गए हैं जिनमें उत्कृष्टता के लिए जुनून था और उन्होंने ऐसी राह पर आगे बढ़ने की इच्छाशक्ति दिखाई जिस ओर कम ही लोग जा सके हैं। ऐसा करके, उन्होंने हमारे जीवन में महत्वपूर्ण बदलाव लाने में सफलता प्राप्त की है।

11. मैं एक बार पुनः सभी पुरस्कार विजेताओं को बधाई देता हूं। मैं उन लोगों की, विशेष रूप से निर्णायक-मंडल की भूमिका की भी सराहना करता हूं जिन्होंने इन पुरस्कारों के संबंधित प्रक्रिया से जुड़े उच्च मापदंडों को बनाए रखा है।

12. अंतत:, इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपना उद्बोधन समाप्त करूँगा कि व्यापार जगत के भावी नेताओं के रूप में, आप अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए, देश को समृद्धि की नई ऊँचाइयों पर ले जाएंगे और एक ऐसे समाज की स्थापना करने में मददगार होंगे जहाँ सभी के बीच परस्पर खुशहाली, सच्चाई और विश्वास की भावना हो। आपके भावी प्रयासों के लिए आप सभी को मेरी बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

धन्यवाद,

जय हिन्द!