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मैसूर के महाराजा, स्‍व. श्री जयचामराज वाडियार के जन्मशती समारोहों के अवसर पर भारत के राष्‍ट्रपति, श्री राम नाथ कोविन्‍द का संबोधन

मैसूर : 10.10.2019

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1. इस वर्ष हम महामहिम महाराजा जयचामराज वाडियार की जन्म शताब्दी मना रहे हैं। इस अवसर पर, हम यह विचार करें कि उस युग में ऐसी क्या विशेषता थी जिसने अनेक महान विभूतियों को जन्म दिया। हमारे राष्ट्र को स्वरूप देने वाले वे लोग दूरदर्शी तो थे ही, अपितु उन सभी का व्यक्तित्व बहुआयामी प्रतिभाओं से समृद्ध था। मैसूर राज्य के 25वें महाराजा, महाराज वाडियार एक असाधारण शासक और कुशल प्रशासक थे। वे एक प्रतिष्ठित दार्शनिक, संगीत व्याख्याता, राजनीतिक विचारक और परोपकारी महापुरुष थे।

2. हमें यह देखकर अत्यंत हर्ष और संतोष का अनुभव होता है कि उनकी परंपरा को महाराजा के परिवार—जन और मित्रगण आगे बढ़ा रहे हैं। इस अमूल्य धरोहर के पुनरुद्धार और संरक्षण में महाराजा वाडियार की सुयोग्य पुत्रवधू श्रीमती प्रमोदा देवी वाडियार की निष्ठा से भी विशेष रूप से प्रभावित हुआ हूं। वे सराहना और प्रशंसा की पात्र हैं।

3. आज यहां महाराजा वाडियार का स्मरण करते हुए हम कह सकते हैं कि उनका श्रेष्ठतम चरित्र-चित्रण, सर्वाधिक प्रतिष्ठित लोकतंत्रवादी राजाधिराज के रूप में किया जा सकता है।

4. राजकुमार वाडियार मात्र 21 वर्ष के थे जब 11 मार्च, 1940 को उनके पिता नरसिंहराजा वाडियार का निधन हुआ औरयुवराज के पद पर उनका अभिषेक हुआ। पांच ही महीने बाद, उनके चाचा महाराजा कृष्णराजा वाडियार का भी देहांत हो गया और युवराज 8 सितम्बर, 1940 को सिंहासन पर आरूढ़ हुए।

5. महाराजा बनते ही उन्होंने 1940 का संशोधित संविधान मैसूर राज्य पर लागू कर दिया। 9 जून, 1941 को मैसूर राज्य विधान मण्डल के दोनों सदनों के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, ‘‘संवैधानिक प्रगति की मशाल, पारिवारिक विरासत के रूप में मुझे सौंपी गई है। यह मेरी, और मुझे विश्वास है कि आपकी भी, महत्वाकांक्षा है कि इस मशाल की ज्योति मद्धिम न पड़े, बल्कि समय के साथ—साथ और भी उज्ज्वल होती रहे।’’

6. भारत के स्वतंत्र होने पर, भारत के रजवाड़ों में से, विलय पत्र को स्वीकार करने वाले, वे पहले शासक थे। महाराजा ने विलय—पत्र पर 9 अगस्त, 1947 को हस्ताक्षर कर दिए थे और संघ सरकार ने 16 अगस्त, 1947 को उसे स्वीकार कर लिया। इस तरह उन्हें लोकतन्त्र की ओर भारत के प्रस्थान का प्रतीक समझा जाना चाहिए। नव—स्वाधीन देश की एकता और अखंडता के लिए उनके अग्रणी योगदान को कभी भुलाया नहीं जाएगा।

7. विलय के बाद, 1 नवम्बर, 1956 तक महाराजा ने मैसूर राज्य के राजप्रमुख का पद संभाला। उसी दिन, जनता की मांग पर, भारत के राष्ट्रपति ने उन्हें नवगठित मैसूर राज्य का राज्यपाल नियुक्त किया। वे इस पद पर 4 मई, 1964 तक बने रहे। 1975 में मैसूर का नाम कर्नाटक कर दिया गया।

8. क्या हम यह विचार कर सकते हैं कि इस भूमि में ऐसी क्या विशेषता है जिसके कारण यहां श्रेष्ठतम सामाजिक मूल्यों और प्रवृत्तियों का विकास होता है? इसके कारण ही एक महाराजा अपनी जनता के हित को सर्वप्रथम दायित्व मानता है। स्वतंत्रता से ठीक पहले महाराजा द्वारा लिए गए निर्णय से स्पष्ट होता है कि इस भूमि में हमेशा से लोकतान्त्रिक मूल्यों की जड़ें गहरी रही हैं। पश्चिमी देशों में लोकतंत्र को अपनाए जाने काफी पहले ही, कर्नाटक में 12वीं शताब्दी के दौरान महान संत बसवेश्वर ने लोकतांत्रिक और जन—केंद्रित शासन के महत्व पर बल दिया।

9. पश्चिमी सभ्यता की सकारात्मक प्रवृतियों को आत्मसात करने के साथ-साथ, महाराजा वाडियार ने समृद्ध स्थानीय परम्पराओं से प्रगतिशील जीवन-मूल्यों को भी ग्रहण किया था। उनकी पीढ़ी के अन्य महान नेताओं की तरह, उनके निजी जीवन—मूल्यों में भी, परंपरा और आधुनिकता का संगम था। इसकी सर्वोत्तम अभिव्यक्ति राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने इन शब्दों में की है, ‘‘मैं अपने घर को चारों ओर दीवारों से घेर नहीं लेना चाहता और न खिड़कियों को बंद कर रखना चाहता हूं। मैं तो चाहता हूं कि सब देशों की संस्कृतियां मेरे घर के चारों ओर अधिक से अधिक निर्बाध रूप से प्रवाहित हो सकें। अलबत्ता मैं यह कभी नहीं चाहूंगा कि उनके तेज झोंके मेरे पांव ही उखाड़ दें। मैं किसी दूसरे के घर में एक अवांछनीय मेहमान, भिखारी या गुलाम के रूप में रहना भी बर्दाश्त नहीं करूंगा।’’

10. निश्चय ही, गांधीजी और महाराजा वाडियार के मन में ऋग्वेद का यह संदेश रहा होगा, ‘‘आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः’’ श्रेष्ठ विचार, सभी दिशाओं से, हमारे पास आएं।

11. वैचारिक उदारता के प्रति महाराजा का दृष्टिकोण संगीत के प्रति उनके गहन अनुराग में व्यक्त हुआ। वे पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत और कर्नाटक शास्त्रीय संगीत, दोनों में समान रूप से निष्णात थे और उन्होंने दोनों ही परम्पराओं को समृद्ध किया। उन्होंने शास्त्रीय रागों में कृतियों की रचना की। साथ ही, पश्चिम के महान वादकों और संगीतकारों को भी सम्मानित किया। संगीत नाटक अकादमी के कार्यकारी बोर्ड के प्रथम सदस्य, और बाद में इसके अध्यक्ष के रूप में उन्होंने ललित कलाओं के प्रति अपने उत्साहका सार्थक उपयोग किया। मुझे इसी वर्ष फरवरी में संगीत नाटक अकादमी के पुरस्कार प्रदान करने का सुअवसर प्राप्त हुआ।

12. महाराजा वाडियार भारतीय दर्शन के असाधारण विद्वान तो थे ही, उन्होंने ‘जयचामराज ग्रंथ रत्न माला’ के जरिए विद्वत्ता को प्रोत्साहन भी दिया। इस ग्रंथमाला से कन्नड़ भाषा और साहित्य की श्रीवृद्धि हुई है। इस ग्रंथमाला में प्रकाशित पुस्तकों में, ऋग्वेद के कुछ खंडों सहित अनेक पवित्र ग्रन्थों और शास्त्रीय रचनाओं के संस्कृत से कन्नड़ अनुवाद शामिल हैं। उनके अपने प्रकाशित ग्रन्थों में, महाराजा, हमारे मौलिक द्रष्टाओं के संदर्शन की तलाश द्वारा परम सत्य की खोज में लगे दिखाई देते हैं। ‘गीता’, ‘अद्वैत’, ‘योग’ ‘शास्त्र’ और ‘पुराणों’ से लेकर सौन्दर्य तथा कला जैसे उदात्त विषयों पर महाराजा की विविध कृतियों से युवा अध्येता लाभान्वित हो सकते हैं।

13. उद्यमिता को बढ़ावा देने के उनके प्रयास भी प्रेरणादायक हैं। मैसूर के शासक के रूप में उन्होंने 1940 में ही, बंगलुरु में हिंदुस्तान एयरक्राफ्ट कंपनी की औद्योगिक इकाई की स्थापना को सक्रिय प्रोत्साहन दिया। इसका उद्देश्य, दूसरे विश्व युद्ध में सरकार के प्रयासों में सहायता देना था। यही इकाई विकसित होकर आज सार्वजनिक क्षेत्र का प्रमुख उपक्रम — हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेडबन गई है।

14. मुझे यह जान कर प्रसन्नता हुई कि महाराजा ने मैसूर में एक शानदार महल, चेलुवांबा मैंशन, सेंट्रल फूड टेक्नॉलॉजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट की स्थापना के लिए सरकार को दान कर दिया। उनके ऐसे ही दानकार्यों से, सरकार को बंगलुरु में नेशनल ट्यूबरकुलोसिस इंस्टीट्यूट तथा मैसूर में ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ स्पीच एंड हियरिंग की स्थापना में मदद मिली।

15. यह आश्चर्य की बात है कि 55 वर्ष की अल्पायु वाले, अत्यधिक व्यस्त जीवन में, वे पारिस्थितिकी के लिए भी समय निकाल सके और राष्ट्रीय वन्यजीवन बोर्ड से भी जुड़े रहे।

16. महाराजा वाडियार जैसे महान चरित्रों ने हमारे वर्तमान जीवन को स्वरूप दिया है। अपने दैनंदिन जीवन में, उनके जीवन—मूल्यों और जीवन—दृष्टि का अनुसरण करके ही उनकी जन्म—शताब्दी पर हम उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दे सकते हैं।

17. ऐसे महामानव को श्रद्धांजलि देते हुए, मुझे स्मरण हो रहा है कि मेरे प्रख्यात पूर्ववर्तियों में से एक, डॉक्टर एस. राधाकृष्णन ने महाराजा का उत्कृष्ट चित्रण ‘आराधक’और ‘साधक’ के रूप में किया था। वह निश्चय ही असाधारण व्यक्तित्व के धनी थे। इन्हीं शब्दों के साथ, मैसूर के महाराजा, परम मनीषी जयचामराज वाडियार की स्मृति में आयोजित इस समारोह की मैं सराहना करता हूं।

धन्‍यवाद,

जय हिन्‍द!